अपनी पसंद की खबर खोजें
बिलासपुर: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने दुष्कर्म के कारण गर्भवती हुई एक नाबालिग को बड़ी राहत देते हुए उसके गर्भसमापन की अनुमति दे दी है। जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद की सिंगल बेंच ने धमतरी के मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) को आदेश दिया है कि पीड़िता को तत्काल रायपुर के सरकारी चिकित्सा अस्पताल में भर्ती कराया जाए। वहां विशेषज्ञ चिकित्सकों की टीम की निगरानी में कानून के दायरे में रहते हुए गर्भसमापन की प्रक्रिया पूरी की जाएगी।
मार्च 2025 में हुआ था यौन हमला
पीड़िता ने अपने प्राकृतिक संरक्षक के जरिए हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। याचिका के अनुसार, नाबालिग के साथ मार्च 2025 में कथित तौर पर यौन हमला हुआ था। उसकी शिकायत पर भारतीय न्याय संहिता की धारा 65(1) और पॉक्सो एक्ट की धारा 4 व 6 के तहत एफआईआर दर्ज की गई थी।
मेडिकल बोर्ड ने बताया- 31 सप्ताह 6 दिन का है गर्भ
मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने 23 सितंबर को मेडिकल बोर्ड गठित कर पीड़िता की जांच कराने के निर्देश दिए थे। बोर्ड ने 25 सितंबर को सौंपी अपनी रिपोर्ट में बताया कि गर्भावस्था 31 सप्ताह 6 दिन की है और भ्रूण जीवित होने के साथ सामान्य रूप से विकसित हो रहा है।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि इस अवस्था में गर्भसमापन के दौरान रक्तस्राव, संक्रमण और अन्य जटिलताओं का खतरा रहता है। हालांकि, विशेषज्ञ टीम और पर्याप्त सुविधाओं के साथ यह प्रक्रिया संभव है। धमतरी जिला अस्पताल में मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ उपलब्ध नहीं हैं, इसलिए बोर्ड ने किसी उच्चस्तरीय संस्थान में उपचार कराने की सिफारिश की।
जबरन गर्भ जारी रखना गरिमा और अधिकारों का हनन
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि दुष्कर्म से हुई गर्भावस्था में पीड़िता को होने वाली मानसिक पीड़ा को कानून गंभीर चोट की श्रेणी में मानता है। कोर्ट के मुताबिक, किसी नाबालिग को उसकी इच्छा के विरुद्ध गर्भ जारी रखने के लिए मजबूर करना उसकी गरिमा, निजता, शारीरिक स्वायत्तता और प्रजनन संबंधी अधिकारों को प्रभावित करेगा। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में पीड़िता का सर्वोत्तम हित सर्वोपरि होना चाहिए।
रायपुर CMHO को सभी इंतजाम करने के निर्देश
कोर्ट ने रायपुर के मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी को निर्देश दिया है कि उपचार, एंबुलेंस, रक्त, नवजात की देखभाल और मनोवैज्ञानिक सहायता समेत सभी जरूरी व्यवस्थाएं सुनिश्चित की जाएं। साथ ही जांच के लिए भ्रूण से जुड़े जैविक नमूने सुरक्षित रखने को कहा गया है। इस पूरे मामले में दो सप्ताह के भीतर अनुपालन रिपोर्ट कोर्ट में पेश करनी होगी।