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हरेली पर जीवंत होती है छत्तीसगढ़ की सदियों पुरानी 'सवनाही' कला, गोबर से बनती है सुरक्षा और संस्कृति की अनोखी पहचान
छत्तीसगढ़

हरेली पर जीवंत होती है छत्तीसगढ़ की सदियों पुरानी 'सवनाही' कला, गोबर से बनती है सुरक्षा और संस्कृति की अनोखी पहचान

Mor Anchal Desk 30 July 2026
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रायपुर। सावन मास और छत्तीसगढ़ के प्रथम लोकपर्व हरेली अमावस्या के आगमन के साथ ही प्रदेश के ग्रामीण अंचलों में सदियों पुरानी पारंपरिक भित्ति चित्रकला 'सवनाही' एक बार फिर जीवंत हो उठती है। दुर्ग, गरियाबंद, बिलासपुर और बस्तर संभाग सहित कई गांवों में महिलाएं घरों की चौखटों और दीवारों पर गोबर और चावल के आटे से पारंपरिक आकृतियां बनाकर संस्कृति और लोकविश्वास की इस अनमोल विरासत को संजो रही हैं।

हरेली के दिन सुबह महिलाएं घर की सफाई के बाद गाय के ताजे गोबर और पीथन (चावल के आटे का घोल) से मुख्य द्वार पर विशेष आकृतियां उकेरती हैं। इस कला में किसी ब्रश या रंग का उपयोग नहीं किया जाता, बल्कि चार उंगलियों से सुरक्षा घेरे के भीतर मनुष्य, पशु, नाग, लोकदेवताओं और शिकार जैसे पारंपरिक चित्र बनाए जाते हैं।

लोकविश्वास और वैज्ञानिक सोच का संगम

ग्रामीण मान्यता है कि सवनाही का अंकन घर को नकारात्मक शक्तियों, तंत्र-मंत्र और बुरी नजर से सुरक्षित रखता है। वहीं विशेषज्ञों के अनुसार गोबर में प्राकृतिक कीटाणुनाशक गुण होते हैं, जो मानसून के दौरान फैलने वाले संक्रमण और कीट-पतंगों से बचाव में भी सहायक माने जाते हैं।

सावन के दौरान कई गांवों में पारंपरिक 'गांव बांधने' की रस्म भी निभाई जाती है। इस दौरान बैगा (पारंपरिक पुरोहित) शीतला माता की पूजा कर गांव की सुख-समृद्धि और महामारी से सुरक्षा की कामना करते हैं। इसके बाद प्रत्येक घर के द्वार पर सवनाही के प्रतीक अंकित किए जाते हैं।

आधुनिक दौर में भी जीवित है परंपरा

कंक्रीट के मकानों और आधुनिक जीवनशैली के बावजूद छत्तीसगढ़ के अनेक गांव आज भी इस लोक परंपरा को पूरे उत्साह से निभा रहे हैं। संस्कृति विशेषज्ञों का मानना है कि सवनाही, नोहडोरा और गोवर्धन चित्रकारी जैसी लोक कलाएं केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं हैं, बल्कि प्रकृति, पर्यावरण और ग्रामीण जीवन के गहरे संबंध को भी दर्शाती हैं।

सावन की फुहारों के बीच गोबर से सजी दीवारें और उन पर उकेरी गई सवनाही की आकृतियां आज भी छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोक संस्कृति, परंपरा और सांस्कृतिक पहचान की जीवंत मिसाल बनी हुई हैं।